यह विश्लेषण भारत की राजनीति में गहराई से बदलाव को दर्शाता है, जो स्वतंत्रता के बाद समानता और कल्याणकारी दृष्टिकोण पर केंद्रित थी, लेकिन अब मुख्य रूप से मध्यम वर्ग की प्राथमिकताओं और व्यक्तिगत कर राहत जैसे मुद्दों तक सीमित हो गई है।
हेरोल्ड लैसवेल की परिभाषा का संदर्भ:
हेरोल्ड लैसवेल ने राजनीति को “कौन, क्या और कब पाता है” के रूप में परिभाषित किया। इस दृष्टिकोण से राजनीति शक्ति और संसाधनों के वितरण की प्रक्रिया है। भारत में, यह संघर्ष स्वतंत्रता के बाद सामाजिक और आर्थिक समानता के आदर्शों के माध्यम से संचालित हुआ।
स्वतंत्रता के बाद का भारत और समानता का महत्व:
*अंबेडकर की चेतावनी:
बी.आर. अंबेडकर ने भारत के राजनीतिक लोकतंत्र को “सतही” (superficial) करार देते हुए आगाह किया था कि जब तक सामाजिक और आर्थिक असमानताएं बनी रहेंगी, राजनीतिक लोकतंत्र खतरे में रहेगा। उनका यह विचार भारतीय संविधान और नीतियों में समानता की नींव रखता है।
*कांग्रेस का समाजवाद और व्यावहारिक असफलता:
कांग्रेस पार्टी ने समाजवाद का नारा लगाया, लेकिन यह नारा अक्सर केवल भाषणों तक सीमित रहा।
**कल्याणकारी राज्य का अभाव**: भारत ने सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, और सामाजिक सुरक्षा जैसी बुनियादी संरचनाओं का निर्माण नहीं किया। ये सुविधाएं न केवल असमानताओं को कम कर सकती थीं, बल्कि समाज के सबसे कमजोर वर्गों को सशक्त भी कर सकती थीं।
**अमीर-गरीब की खाई**: भारत में आजादी के बाद से ही अमीर और गरीब के बीच की खाई बढ़ती रही। समानता के वादे को पूरा करने के लिए ज़रूरी संस्थागत बदलाव नहीं किए गए।
आधुनिक राजनीति और मध्यम वर्ग का प्रभुत्व:
*समानता का गायब होता विमर्श:
आज की राजनीति में समानता का मुद्दा प्राथमिकता नहीं रह गया है।
**मध्यम वर्ग की अपील**:
2024 के लोकसभा चुनावों और उससे पहले के बजट विमर्शों में, मुख्य पार्टियों ने पुनर्वितरण या गरीबों के लिए कल्याणकारी योजनाओं के बजाय मध्यम वर्ग की कर-राहत पर ध्यान केंद्रित किया। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट में मध्यम वर्ग के लिए करों में राहत देने की बात की। विपक्ष ने सरकार को इस आधार पर घेरा कि यह राहत पर्याप्त नहीं है।
**व्यवसाय-केंद्रित दृष्टिकोण**:
मीडिया और राजनीतिक विमर्श में भी मुख्य रूप से मध्यम वर्ग के आर्थिक हितों पर चर्चा होती है। गरीब और वंचित वर्ग इस विमर्श से गायब हैं।
संपत्ति पुनर्वितरण की गिरावट:
*सामाजिक-आर्थिक असमानता में वृद्धि:
पुनर्वितरण (redistribution) का अर्थ है संपत्ति और संसाधनों को गरीब और वंचित वर्गों तक पहुंचाना।
– **नीतियों का व्यक्तिगत करों तक सीमित होना**:
– हाल के बजट में किसी भी प्रकार के व्यापक कल्याणकारी उपायों की घोषणा नहीं हुई।
– समानता की ओर ले जाने वाले सुधार जैसे भूमि सुधार, श्रम सुधार, और उच्च-गुणवत्ता वाली सार्वजनिक शिक्षा या स्वास्थ्य पर चर्चा ही नहीं होती।
– **अमीरों का प्रभुत्व**:
आर्थिक असमानताओं में बढ़ोतरी इस बात की ओर इशारा करती है कि नीति निर्माण पर प्रभावशाली और संपन्न वर्गों का नियंत्रण बढ़ गया है।
दीर्घकालिक प्रभाव और चुनौतियां:
*चुनावी प्राथमिकताओं में बदलाव:
– राजनीति अब उन वर्गों की जरूरतों पर केंद्रित होती जा रही है जो संगठित हैं और प्रभाव डालने में सक्षम हैं, जैसे कि मध्यम वर्ग।
– गरीबों और असंगठित क्षेत्र की आवाज़ें हाशिए पर चली गई हैं।
*कल्याणकारी राज्य का विघटन:
– भारत का संविधान एक कल्याणकारी राज्य की परिकल्पना करता है।
– आज का विमर्श इस बुनियादी विचार से हटकर केवल मध्यम वर्ग और बाजार केंद्रित मुद्दों पर केंद्रित हो गया है।
– स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी सार्वभौमिक सेवाओं का अभाव आर्थिक असमानता को और बढ़ाएगा।
*सामाजिक अस्थिरता का खतरा:
– यदि असमानता को प्राथमिकता नहीं दी जाती, तो यह सामाजिक असंतोष और अस्थिरता को बढ़ावा दे सकती है।
– आर्थिक और सामाजिक समानता की अनदेखी भारत की लोकतांत्रिक नींव को कमजोर कर सकती है।
निष्कर्ष:
भारत में राजनीति का ध्यान “कौन क्या पाता है” से हटकर “मध्यम वर्ग क्या चाहता है” पर केंद्रित हो गया है। यह बदलाव न केवल राजनीतिक प्राथमिकताओं को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि भारतीय लोकतंत्र का आर्थिक और सामाजिक न्याय के प्रति दृष्टिकोण कैसे बदल रहा है। इस बदलाव का समाधान तभी संभव है जब नीति-निर्माण में समानता को दोबारा केंद्रीय स्थान दिया जाए और वंचित वर्गों की आवाज़ों को मजबूत किया जाए।

